भीतर का दीपक

 

एक छोटे से गाँव में, जहाँ चारों ओर हरे-भरे खेत और शांत नदी बहती थी, वहाँ अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। गाँव का वातावरण बहुत शांत था, लेकिन अर्जुन का मन कभी शांत नहीं रहता था।




वह हमेशा भविष्य की चिंता करता रहता थापैसे की चिंता, सफलता की चिंता, और इस बात की चिंता कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं।

जब गाँव के लोग सरल जीवन में खुश रहते, हँसते-बोलते और प्रकृति का आनंद लेते, तब भी अर्जुन को लगता था कि उसकी जिंदगी में कुछ कमी है।

एक शाम वह नदी के किनारे टहल रहा था। तभी उसने देखा कि एक वृद्ध साधु बरगद के पेड़ के नीचे बैठे हैं। उनके चेहरे पर गहरी शांति थी। उनकी आँखें बंद थीं और ऐसा लगता था जैसे वे किसी गहरे ध्यान में डूबे हुए हों।

अर्जुन उत्सुकता से उनके पास गया।

बाबा,” उसने विनम्रता से कहा, “क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हूँ?”

साधु ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और मुस्कुराते हुए बोले,
हाँ पुत्र, पूछो।

अर्जुन उनके पास बैठ गया और बोला,
सब कहते हैं कि शांति हमारे भीतर होती है, लेकिन मुझे वह कभी नहीं मिलती। मेरा मन हमेशा बेचैन रहता है। मैं आपके जैसा शांत कैसे बन सकता हूँ?”

साधु ने अपने पास रखे एक छोटे दीपक को उठाया।  



उन्होंने पूछा, बेटा, बताओ जब किसी कमरे में अंधेरा हो जाता है, तो क्या किया जाता है?”

अर्जुन ने तुरंत उत्तर दिया, “दीपक जलाया जाता है।

साधु ने सिर हिलाया और पूछा,
और क्या अंधेरा उस दीपक से लड़ता है?”

अर्जुन ने कहा, “नहीं, दीपक जलते ही अंधेरा अपने आप गायब हो जाता है।

साधु मुस्कुराए और बोले,
ठीक उसी तरह, मन का अंधकार लड़ने से नहीं मिटता। वह तब मिटता है जब भीतर का दीपक जलता है।

अर्जुन थोड़ा उलझ गया।

भीतर का दीपक क्या होता है?” उसने पूछा।

साधु धीरे-धीरे उठे और नदी के किनारे चलने लगे। अर्जुन भी उनके साथ चलने लगा।

कुछ देर बाद साधु ने नदी की ओर इशारा किया।

नदी को ध्यान से देखो,” उन्होंने कहा।

नदी का पानी शांत बह रहा था और उसमें डूबते हुए सूरज का सुंदर प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।

तुम क्या देख रहे हो?” साधु ने पूछा।



अर्जुन बोला, “मैं नदी में आकाश और सूर्य का प्रतिबिंब देख रहा हूँ।

साधु ने एक छोटा सा पत्थर उठाकर पानी में फेंक दिया। पानी में लहरें उठने लगीं और प्रतिबिंब गायब हो गया।

अब क्या दिखाई दे रहा है?” साधु ने पूछा।


अर्जुन ने कहा, “अब पानी अशांत हो गया है, कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा।

साधु ने धीरे से कहा,
मन भी इसी नदी की तरह है। जब मन शांत होता है, तब वह सत्य और शांति को स्पष्ट रूप से देख सकता है। लेकिन जब मन चिंता, इच्छाओं और डर से भरा होता है, तब उसमें कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता।

अर्जुन ने गंभीरता से यह बात सुनी।

तो मन को शांत कैसे किया जाए?” उसने पूछा।

साधु फिर बरगद के पेड़ के नीचे बैठ गए।


उन्होंने कहा
,

सबसे पहले, बाहर खुशी ढूँढना बंद करो। अधिकतर लोग पूरी जिंदगी धन, प्रसिद्धि और दूसरों की स्वीकृति के पीछे भागते रहते हैं। लेकिन ये सब चीजें परछाईं की तरह होती हैं। जितना उनका पीछा करो, वे उतनी ही दूर चली जाती हैं।

अर्जुन ने कहा,
लेकिन दुनिया तो यही सिखाती है कि अधिक पाने में ही सफलता है।

साधु ने मुस्कुराकर जमीन से एक सूखा पत्ता उठाया।


इस पत्ते को देखो,” उन्होंने कहा।
कभी यह हरा-भरा और जीवित था। अब यह सूखकर जमीन पर गिर गया है। जीवन में सब कुछ बदलता हैधन, युवावस्था, शक्ति, यहाँ तक कि रिश्ते भी।

फिर उन्होंने अर्जुन की ओर देखकर कहा,


लेकिन तुम्हारे भीतर एक ऐसी चीज है जो कभी नहीं बदलती।

अर्जुन ने उत्सुकता से पूछा,
वह क्या है?”

साधु बोले,
वह है तुम्हारा सच्चा आत्मस्वरूप। जब तुम उससे जुड़ते हो, तब शांति अपने आप आ जाती है।

अर्जुन ने धीरे से पूछा,
मैं उससे कैसे जुड़ सकता हूँ?”

साधु ने तीन सरल बातें बताईं।

पहली बातहर दिन कुछ समय शांत बैठो। आँखें बंद करो और अपने विचारों को बिना लड़ाई के देखो। धीरे-धीरे मन शांत होने लगेगा।


दूसरी बातकृतज्ञता का अभ्यास करो। जो नहीं है, उस पर ध्यान देने के बजाय जो है, उसके लिए आभारी बनोजीवन, साँस, प्रकृति, परिवार।

तीसरी बातदूसरों की सेवा करो। जब तुम बिना किसी स्वार्थ के किसी की मदद करते हो, तो तुम्हारा हृदय हल्का हो जाता है।

अर्जुन की आँखों में उम्मीद चमकने लगी।

क्या सच में इतना सरल है?” उसने पूछा।

साधु हँस पड़े।

सत्य हमेशा सरल होता है। केवल हमारा मन उसे कठिन बना देता है।

सूरज अब पहाड़ियों के पीछे छिपने लगा था। पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे।


अर्जुन के भीतर एक नई शांति का अनुभव हो रहा था।

उसने हाथ जोड़कर पूछा,
बाबा, क्या मुझे कभी सच्ची शांति मिलेगी?”

साधु ने प्रेम से उसकी ओर देखा और कहा,


शांति तुम्हारे भीतर पहले से ही है। तुम बस उसे ढूँढना भूल गए हो।

फिर उन्होंने अर्जुन के हृदय की ओर इशारा किया।

दीपक पहले से ही तुम्हारे भीतर है।

उस रात अर्जुन घर गया और पहली बार शांत होकर बैठा। उसने आँखें बंद कीं और अपने विचारों को देखना शुरू किया।

शुरू में उसका मन इधर-उधर भागता रहायादें, चिंताएँ, योजनाएँ।

लेकिन धीरे-धीरे सब शांत होने लगा।

उस शांति में अर्जुन ने अपने भीतर एक हल्की सी गर्माहट महसूस की।

दिन हफ्तों में बदल गए। अर्जुन रोज ध्यान करने लगा। वह गाँव के लोगों की मदद करने लगा। उसने छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूँढना शुरू कर दियासूर्योदय, हवा की ठंडक, बच्चों की हँसी।

धीरे-धीरे उसके मन की बेचैनी खत्म होने लगी।

गाँव के लोग भी यह बदलाव देखने लगे।

अर्जुन बदल गया है,” वे कहते।
वह अब बहुत शांत लगता है।

एक दिन अर्जुन फिर बरगद के पेड़ के पास साधु को धन्यवाद देने गया।

लेकिन वहाँ साधु नहीं थे।

केवल वही छोटा दीपक पेड़ के नीचे रखा था।



अर्जुन ने उसे उठाया और मुस्कुरा दिया।


अब उसे साधु की बात पूरी तरह समझ आ गई थी।

वह दीपक बाहर की दुनिया को रोशन करने के लिए नहीं था।

वह उसे यह याद दिलाने के लिए था कि असली प्रकाश उसके भीतर है।

और उस दिन से अर्जुन जहाँ भी गया, अपने भीतर की रोशनी साथ लेकर गयाशांति, प्रेम और करुणा बाँटते हुए।

क्योंकि जो व्यक्ति अपने भीतर का प्रकाश खोज लेता है, उसके जीवन में फिर कभी अंधकार हावी नहीं हो सकता।

 The End